सोमवार, 13 जून 2011

अंतिम गवाही

 रात की तन्हाई में फिर गूंज रही है कर्कश सी सायरन की आवाज़ 
फिर किसी का मेरे घर की कुण्डी खटखटाना 
देने लगता है मुझे आभास कि फिर किसी की मौत के अंतिम क्षणों में मेरी गवाही है
कि कागज के एक कोरे पन्ने पर जिन्दगी ने अपने अंतिम दस्तखत कर दिए है कि 
 डॉक्टर ने की है तस्दीक  कि
जिन्दगी अपनी जिन्दगी  की अंतिम गवाही तक जीवित थी 
अपने कोरे पन्ने में अनेक जिंदगियों के आखरी लफ़्ज़ों को सहेजते हुए 
मैं सोचता हूँ कि औरतें तो है अक्सर आग में जलती 
पर क्यों कभी यह आदमियों को नहीं लगती जलने के बाद भी 
जलते बदन और तार तार कपड़ो में जलते शरीर की गंध के बीच भी वह कैसे उन पाशविक कृत्यों को अपने अंतिम लफ़्ज़ों में भी बयान  नहीं करती क्यों नहीं समझती कि पशुओ पर इसका कोई असर नहीं होता 
वे तो अपने को बचने के लिए ये ढोंग रचते है 
तेरी जैसी मासूम द्वारा इन्हे अंतिम क्षणों में भी बचने के प्रयास से ये कुत्ते भेडिये बन जाते है 
फिर करते है शादी फिर किसी मासूम को जलाते है 
रात में गूंजती है कर्कश सायरन की आवाज़ 
यंत्रवत मेरे हाँथ फिर किसी कोरे कागज पर चले जाते है 
यंत्रवत से मेरे हाथ फिर किसी .......................................
मनीष शर्मा 
तहसीलदार बसोदा

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