पन्नियों की पोटली पीठ पर टांगे
वह आज बहुत खुश लग रही थी
दिवाली का आज दूसरा दिन है
घरों के बहार चले हुए पथाखों की चिंदिया बिखरी हुई हैं
यहाँ वहां कुछ अधजली फुलझड़िया भी पड़ी है
पटाखों की चिंदियों को वह एक अख़बार
की कतरन पर रख कर जलती है
की कतरन पर रख कर जलती है
जब सर्राटे की आवाज़ के साथ
वह जलते है तो तालियाँ बजाकर खिलखिलाती है
घर घर में मांगने के लिए आवाज़ लगाती है
कही से मिलती दुत्कार तो कही से
कुछ चिल्लर बताशे व लाये मिलते है
कुछ चिल्लर बताशे व लाये मिलते है
आज का दिन उसके लिए खुशियों का है
क्यूंकि आज उसने दिवाली मनाई है
पटाखे भी चलाये और लाई भी खाई है
सोचता हूँ मैं की कई लोगों के घरों में
आज के दिन लक्ष्मी आ गई है
आज के दिन लक्ष्मी आ गई है
पर इस नन्ही लक्ष्मी के कपडे भूख और बेचारगी देख
मेरा दिवाली मानाने का आनंद कही खो गया है
सोचता हूँ लोगों के इस तरह दिवाली मानाने
से मेरा देश और भी अधिक गमजदा हो गया है
मेरा देश और भी गमजदा हो गया है..............................
मनीष शर्मा
तहसीलदार बसोदा

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