मंगलवार, 21 जून 2011

उसकी भी दिवाली



फटी फ्राक और मैले कुचैले बालों में 
पन्नियों की पोटली पीठ पर टांगे
वह आज बहुत खुश लग रही थी 
दिवाली का आज दूसरा दिन है
घरों के बहार चले हुए पथाखों की चिंदिया बिखरी हुई हैं 
यहाँ वहां कुछ अधजली फुलझड़िया भी पड़ी है 
पटाखों की चिंदियों को वह एक अख़बार
की कतरन पर रख कर जलती है
जब सर्राटे की आवाज़ के साथ 
वह जलते है तो तालियाँ बजाकर खिलखिलाती है 
घर घर में मांगने के लिए आवाज़ लगाती है 
कही से मिलती दुत्कार तो कही से
कुछ चिल्लर बताशे व लाये मिलते है 
आज का दिन उसके लिए खुशियों का है 
क्यूंकि आज उसने दिवाली मनाई है 
पटाखे भी चलाये और लाई भी खाई है
सोचता हूँ मैं की कई लोगों के घरों में
 आज के दिन लक्ष्मी आ गई है
 पर इस नन्ही लक्ष्मी के कपडे भूख और बेचारगी देख 
मेरा दिवाली मानाने का आनंद कही खो गया है 
सोचता हूँ लोगों के इस तरह दिवाली मानाने 
से मेरा  देश और भी अधिक गमजदा हो गया है 
मेरा देश  और भी गमजदा हो गया है..............................

मनीष शर्मा 
तहसीलदार बसोदा


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