करुण रुदन न सुनिये आप तो बेखबर रहिये
टूट जाये घर तो क्या ? आप तो नशे में रहिये
क्यूँ करू किसी की मदद मेरे घर में कौन कोई मारा है
यह सोच कर खुश रहिये
संवेदनाओ का गला घोटना है तो बड़ा आसान
पर जब कभी आपके साथ हो यह हादसा
तो न कहियेगा की लोगो के दिल पत्थर के है
कोई मदद को नहीं आता
कि कोई क्यों हमारे बुझे दीपो को नहीं जलाता
अपनापन भुला दीजिये घर को ही देश समझिये
यदि कोई जोर ही दे तो शान से कह दीजिये
मैं क्या दे सकता हूँ
और कन्नी काट कर बच निकालिये
लहरों ने जिसे निगला वो तो अजनबी है
कह कर नए साल तक अपने दिमाग पर न जोर दीजिये
और बोतल की सारी सुरा अपने कंठ में उड़ेल लीजिये
बेशर्म शर्मदारों अभी भी होती है आशंका
कि तुम्हारे अन्दर गैरत बची है की नहीं ?
अपनों पर जब कहर ढहे तुम्हारी आत्मा रोटी नहीं है
इसी भरम में मैं तुम्हे आज जगाता हूँ
जगाओ अपने इन्सान को आज गुहार लगता हूँ
अपनों का दर्द अब और न भुलाईये
कोरे गल ही न चलाकर मदद को आगे भी आईये
जितना भी कर सकते है अर्पण कर दीजिये
जिन्दगी में जो भी कहना था बुरा कर लिया
आज मिला है अवसर नम आँखों से कर मदद प्रायश्चित कीजिये
अपनों को अजनबी न मानिये
संवेदनाओ को शिद्दत से महसूस कीजिये
और इतने पर भी नहीं जागता आपका जमीर
तो खूब कीजिये बातें घटना पर खूब पान चबाइये
पीक निगल निगल कर और भी निर्लज्ज हो जाईये
जिसे मरना हो मरे जाये भाद में आप तो बस खुश हो जाईये
मनीष शर्मा
तहसीलदार बसोदा

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