बुधवार, 22 जून 2011

मेरी भी दीवाली

दीवाली की रात जब भूख से में बिलबिला रहा था 
सामने की हवेली से आती पकवानों की खुश्बू ने
मुझे और भी बैचेन कर दिया 
शायद मेरे झुग्गी के सामने इम्पाला वाला 
वह घर लक्ष्मी का इंतजार कर रहा था 
उसके मालिक ने मेरी पुताई के पैसे 
अगले दिन देने के लिए कहा था 
अहसान जताते हुए गंधाती हुई मिठाई के
 दो टुकड़े और चार बासी पूरिया 
मेमसाब ने दी थी 
खुश्बू ने मेरी आग को और भी भड़का दिया था
मैंने बासी पुरियों के टुकड़े अपने मुह में दबा लिए 
पुष्टे जैसे ये टुकड़े गलने का नाम ही नहीं ले रहे थे 
इतने में मेरा पप्पू दौड़ता हुआ अन्दर घुसा 
हाथ में उसके कागज का एक पुडा था
बोला बापू में फुलझड़ी लाया हूँ 
मैंने अपनी आंखे फैला कर देखा
बमों में मसलों को मेरा वो नन्हा दिया सलाई से 
आग लगाने की कोशिश कर रहा था 
जैसे ही बारूद जला वह ख़ुशी से नाचने लगा 
मैंने बासी मिठाई का टुकड़ा उसके मुह में डाल दिया 
उसने एक उवाकई सी ली और बोला
 बापू क्या इस साल हमें जलेबी खाने नहीं मिलेगी 
दूर कही से किसी के हज़ार पटाखे वाली लड़ 
चलाने की आवाज़ आ रही थी मनो कोई 
हमारी गरीबी का मजाक उड़ा रहा हो 
मनीष शर्मा
तहसीलदार बसोदा

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